जीप घोटाला - घोटालो का बीज

जीप घोटाला - घोटालो का बीज 

जीप खरीद घोटाला आजाद भारत का पहला बड़ा सरकारी घोटाला था. चूंकि उस घोटाले को दबा दिया गया था, इसलिए इसके साथ ही इस गरीब देश में भ्रष्टाचार की मजबूत नींव पड़ गई । इससे आजाद भारत में बाद के घोटालेबाजों का काम भी आसान हो गया। उन लोगों ने समझ लिया कि वे कोई भी घोटाला-महा घोटाला करके बच सकते हैं. यह और बात है कि घोटालों के कारण कुछ लोगों को कभी- कभी सजा भी भुगतनी पड़ती है, पर अपराध के आकार-प्रकार के मुकाबले सजा बहुत कम है ।


हम आज बात करते है आजाद भारत के प्रथम घोटाले की जिसके द्वारा भारत में घोटालों कि परंपरा प्रारंभ हुई । 

वी.के कृष्ण मेनन पर सन् 1949 में जीप घोटाले का गंभीर आरोप लगा । हंगामा हुआ तो केंद्र सरकार ने इसकी प्रारंभिक जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई. जांच कमेटी ने इसे घोटाला माना । न्यायिक जांच की सिफारिश की, पर जांच नहीं हुई । इससे कुछ सत्ताधारियों को लगा कि इससे वामपंथी विचारधारा की एक राजनीतिक हस्ती का अंत हो जाएगा ।

परंतु केंद्र सरकार ने 30 सितंबर, 1955 को यह घोषणा कर दी कि जीप घोटाले के इस मामले को बंद कर दिया गया है । हद तो तब हो गई जब 3 फरवरी, 1956 को कृष्ण मेनन केंद्रीय मंत्री बना दिए गए । 

घोटाला तब हुआ था जब मेनन लंदन में भारतीय उच्चायुक्त थे । कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ की घटनाऐं निरंतर हो रही थी इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना को आधुनिक हथियारों और आवागमन के साधनो की पुरजोर आवश्यकता थी | ऐसे में ब्रिटेन से भारतीय सेना के लिए अत्यंत जरूरी जीप और हथियार खरीदने का भार कृष्ण मेनन को सौंपा गया था ।

उपरोक्त दोनों ही खरीदों के लिए ऐसा कहा जाता था कि ब्रिटेन की विवादास्पद कंपनियों से मेनन ने खुद ही लिखित समझौते कर लिए । उन्होंने ऐसा सरकारी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करके किया । जबकि वास्तविकता में किसी उच्चायुक्त को ऐसे समझौते करने का अधिकार नहीं था और बिना किसी राजनैतिक सहयोग और उत्प्रेरण के ऐसा संभव भी नहीं था ।  पंद्रह सौ जीपों के लिए एक लाख बहत्तर हजार पाउंड कंपनी को अग्रिम राशि का भुगतान भी हो गया । कोई भी अंतर्राष्ट्रीय रक्षा सौदे की औपचारिकता पूरी किए बिना भारी धनराशि अग्रिम के रूप में दे दी गई, जिसके फलस्वरूप पहली खेप के रूप में जो 155 जीपें भारत पहुंचीं भी, तो यह पाया गया कि जीप बंदरगाह से गैराज तक चल कर पहुंचने लायक ही नहीं थी । 


 आश्चर्य की बात है कि रक्षा सौदे की अनियमितता के लिए जिम्मेदार कृष्ण मेनन को सजा देना तो दूर तत्कालीन कोंग्रस सरकार ने मेनन को देश का रक्षा मंत्री भी बना दिया । अंततः मेनन को चीन की लड़ाई में भारत की हार के बाद मंत्री पद छोड़ना पड़ा था, लेकिन इस जीप घोटाले ने ही आजादी के तत्काल बाद ही यह बात साबित कर दी कि राजनीतिक या अन्य तरह की तरक्की पाने के रास्ते में कोई गंभीर घोटाला भी इस देश में किसी समर्थ व्यक्ति के लिए बाधक नहीं है । जीप घोटाले को अन्य घोटालों का ‘बीज घोटाला' कहा जा सकता है |  उस समय की नेहरू सरकार यदि इस घोटालों के बीज, जीप घोटाले की उचित जांच करा कर और नैतिक जिम्मेदारी लेकर कार्यवाही करवाती तो घोटालों कि परंपरा प्रारंभ नहीं होती ।

राष्ट्रीय स्तर पर सन् 1971 के बाद भ्रष्टाचार ने देश में संस्थागत रूप ग्रहण कर लिया । इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, खुद पर भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा भी था कि ‘भ्रष्टाचार तो वर्ल्ड फेनोमेना है’ ।

राजीव गांधी ने सन् 1985 में कहा था कि केंद्र सरकार के 100  पैसों में से 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाते हैं जिनके लिए वे पैसे दिल्ली से चलते हैं । आजादी के बाद से आज तक अनेक घोटालों को लेकर अनेक बड़े राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेताओं के खिलाफ बारी-बारी से ठोस सबूत भी सामने आते रहे. फिर भी कम ही लोगों को सजा दिलाई जा सकी. जान-बूझ कर उन्हें बचा लिया गया । भ्रष्टाचार दो गुनी-चौगुनी रफ्तार में बढ़ता चला गया ।

2014 तक इन घोटालों की एक बहुत बड़ी और वृहद श्रंखला निर्मित हो चुकी थी | जो की भाजपा की मोदी सरकार आने के बाद टूटी है |  परन्तु 70 सालों के इन निरंतर भ्रष्टाचारों और घोटालों के कारण 2014 में निर्मित नवीन सरकार को दो प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है पहला की देश इन 70 वर्षो के निरंतर घोटाला काल के कारण आर्थिक रूप से कमजोर हो चूका है एवं दूसरा की भारत की राजनीती और अफसरशाही में भ्रष्टाचार बहुत गहराई तक पहुंच चूका है जिसे साफ़ करना बहुत बड़ी चुनौती है |


डॉ. शैलेन्द्र सिंह    

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